तेरी चेहरे में ही, न जाने कैसा नूर है
नासमझ, नादान वो, मगर बेक़सूर है।
कितने ही है जो, तेरी एक झलक पा न सके,
परिंदे है वो, फिर भी आसमा से दूर है।
रंग तेरे न जाने कौन-कौन से है
रंगीला आशिक़, हर बार करता भूल है।
शिद्दत से चाहा है तुझें, ओ बेख़बर
जिसको मंज़िल पता है, गया रास्ता भूल है।
आकाश में तारे तो टीम-टिमाएँगे ही
चाँद तो वैसे ही, अकड़ में चूर है।
वो क्या जाने मेरे दिल को हालत को
जिनके बाग़ से, चुरा लिए गये फूल है।
हमसे प्यार की बीते किया न करो
घाव में मेरे, अभी भी सूल है।
नादान मछली, शिकारी से बहुत दूर है
मरीचिका है यह सब, और कुछ धूल है।
तुझे पा न सका मैं, कोई ग़म नहीं
हर मुसाफ़िर को, मिलती नही मंज़िल है।
मुझे भ्रम में रखकर क्या कर लोगें
अंधेरे में भी हीरा, चमकता जरूर है।

No comments