Home poetry आईना आईना Deepak Pawar January 08, 2019 0 comments Share: Facebook Twitter Google+ Pinterest Whatsapp आईना-कुछ गुस्ताखियाँ हमसे नजरें क्यों चुराते हो, हम वही आईना है, जिससे तुम अपना चेहरा सवारते हो, यह तो समय का फेर है की तुमने हमसे मुँह मोड़ लिया, हम तो अभी भी उम्मीद लगा कर बेटे है, ओर तुमने आईना ही, तोड़ दिया.....
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