नादानियाँ

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नादानियों की भी हद होती हैं, जनाब
हम पूछते रह गए,"क्या हुआ ??"
"यह तुमने अच्छा नहीं किया",
बोलकर, हमेशा के लिए चली गई।
तक से अब तक, कभी उन्हें तलाशते
कभी उनके सवाल को,
न वो मिली, न उनका सवाल
ऐसे ही गुजर गए पांच साल
तभी अचानक एक दिन
वो मुझसे टकराई
"दीपक, बोलकर मुझें गले लगाई"
दोनों हाथ, कान पर राखतर
मुझसे "सॉरी" बोलती हैं
अपनी गलती को टटोलती हैं।
मैंने पूछा,"क्या हुआ??"
बोली,"मेरी शादी होने वाली थी
ख़ुसी की लहर छाने वाली थी
कोई तुमसे ग़िला नहीं था
दिल से सुलहा करना ठीक था 
कुछ समझ नहीं आ रहा था
घरवालों का प्रेशर बढ़ता जा रहा था
इसीलिए तुम्हे छोड़कर चली गई
अब उसने भी मुझे छोड़ दिया
कुल्टा, बेहया कहकर 
मुझसे मुँह मोड़ लिया।"
मैं पहले मुस्कुराया, फिर जोर से 
चिल्लाया...आँसू उसके बहने लगे
अब वो मुझसे कहने लगे
कि, "अब मैं तेरे साथ ही रहूंगी।"
सवाल भी मिल चुका था, और वो भी
फिर भी मन में एक कशक थी
दिल की उम्मीद भी मर चुकी थी
उसे मैंने अपना लिया
दिल के एक दुखड़े को 
हमेशा के लिए दफ़ना दिया।।

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