एक वक़्त था, जब मैं
भटकता था तेरी गलियों में
और तुम घर में छिप जाया करती थीं
जब भी करता था प्यार का इज़हार
कानों में उंगलियां रख लिया करती थीं
फिर, दिल ने फैसला कर ही लिया
तुझें मेरी ज़रूरत नहीं तो फ़िर
तुझे मुक्त कर ही दूँ
छोड़ तेरी गली, मोहल्लों में
चला मेरी तक़दीर को आज़माने
सुना हैं की तू आज भी
उसी मोड़ पर मेरा इंतिजार करती हैं
जहाँ मैंने तुझें कभी आने को
कहाँ था, पर तू नहीं आई थीं
और अब मैं भी क्या कर सकता था
निकल आया हूँ आगे
इस दुनिया के रस्मों रिवाजों को
कहीं पीछे छोड़ कर
तुम से भी ख़ूबसूरत
और तुम से भी हँसी महबूबा
मेरी ज़िन्दगी में आ गई हैं
हँसी ख़ुसी से वित रहीं हैं मेरी
तुम भी मुझें भुला देना
किसी के घर जा तुम भी
उजियारा कर देना
मैंने तो अपना घर बसा लिया
पर अकेले में बैठकर मैं
कभी सोचता हूँ की
यदि तुम मेरी जिंदगी में
होती तो क्या होता
मेरी ख़ुसी और तुम्हारे ग़म
का जब मेल होता तो क्या होता
तुम आज वहाँ उस मोड़ पर
खड़ी न होती तो क्या होता
मैं कल भी अधूरा था
और आज भी अधूरा हूँ
मैंने अभी तक जो कुछ भी कहाँ
वह तो बस एक
तुम्हें भुलाने की बात थीं
तुम्हें दूर भला कभी में
जा सकता हूँ
जिसके लिए मैंने 99 बार
चक्कर काटे थे उसी मोड़ पर
सुना हैं की तुम
वहीँ खड़ी हो
मैं अपनी क़िस्मत को आज़माने
फ़िर एक बार आ रहा हूँ
मुझें पता हैं तुम
इस बार जरूर मिलोगी
मैं अपनी जिंदगी बसाने
आ रहा हूँ....
पर यह अब क्या हुआ
मैं आया हूँ आज
और तुम नहीं आई
विश्वास नही होता की
दोस्तों ने मुझें एक बार फ़िर
हँसने के लिए मुझें
जूठी कहानी सुनाई.....
और मैं हर बार की तरह
तुम कल आओगी
दिल को समझाकर लोट आया।।

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