ख़्वाइस की पत्ती, फिर टूट गई

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ख़्वाइस की पत्ती, फिर टूट गई
हवा ऐसी चली की दुनिया रूठ गई

भागा करते थे जो कभी कदम 
बैसाखी थी जो, वह भी छूट गई 

जिस ने लगा रखी थी आग चारों ओर 
धुंआ हटते ही, बुझी हुई राख बन गई

ऐसे टूटे, नजरें आपकी आंखें बन गई 
अभी तो कुछ बोला नहीं की चड़ गई 

इन सितारों के बीच, अकेला चाँद था 
सूरज के उगते ही चांदनी भी छीप गई 

तिनका-तिनका जोड़ कर बनाया था महल  
नीव ऐसी धासी, की सारी इमारत हील गई 

लिख रहा हूँ मैं, कुछ भूला नहीं हूँ 
हालात ऐसे हैं, या आदत बदल गई 

लगा रखे हैं मेरी ज़ुबा पर ताले 
हाथ खोलते ही हथकड़ी टूट गई 

 ख़्वाइस की पत्ती, फिर टूट गई
हवा ऐसी चली की दुनिया रूठ गई

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