होली

Share:

आज मैं सोच रहा हूँ,

कुछ न कुछ तो लिखूँ

पर क्या लिखूँ, 

आज होली हैं न

एक अनजान शहर में, 

अकेला हूँ

ज़ाहिर हैं कि,

हँसी-मज़ाक तो 

लिख नहीं सकता

और ऐसे मौके पर

मोहब्ब पर भी

लिख नहीं सकता,

तो फ़िर

फ़िर सोच क्या, लिखना हैं

इसी पर क्यों न लिखा जाय

इससे मेरी उदासी भी

और नाराज़गी भी

कुछ कम जरूर होगी

पर उस पर भी 

मेरी कलम ने

साथ छोड़ दिया

बोलने लगी की

जब कुछ लिखना हैं तो

अच्छा लिख

फ़ालतू मेरा टाइम 

ख़राब मत कर

फिर मैंने उसे भी रोक दिया

इसीलिए मैंने उसे

अधूरा ही छोड़ दिया

शायद होली ऐसी ही होती है

अधूरी की अधूरी

मेरी कविता जैसी होती है

शायद होली ऐसी ही होती है


No comments