लो मैं तो चला, छोड़ तुझें
मुझें रोकेगी नहीं.....नहीं
कहते हैं, जाने बाले को कभी,
पीछे से टोका नहीं करते है
तुम्हें मेरे जाने का कोई दुःख
नहीं हैं.....बिल्कुल भी नहीं
जिसे करने से तुम्हें खुसी मिले
उसका भला मुझे कैसा दुःख,
कभी हो ही नही सकता
अच्छा तो मेरे जाने के बाद
तुम अपना घर बसा लेना
मेरा घर....मेरा घर तो
तुम बसा चुके हो न
इसे तोड़कर भला मैं
दूसरा घर कैसे बना सकती हूँ
जैसा तुम्हरा दिल करे
तुम बेसे ही करना
चलो हँस कर विदा कर दो
रुको जरा,...मैं अभी आती हूँ
वो अंदर से चली जाती है
कुमकुम और फूलों से सजी
आरती की थाली लाती है
मेरे माथे पर तिलक कर
आरती उतरती है
मैंने कहाँ यह किसलिए
यह तुम्हारी लंबी उम्र के लिए
तभी मुझे आँसू आ जाते है
ओर मै उसे सिने से लगा लेता हूँ
वो मुस्कुराकर बोली....
तुम्हारी ट्रैन का टाइम हो गया
ओर मैं उस हँसते हुए
चेहरे को सदा के लिए
कही पीछे छोड़ आया
और आज इस गुमनाम शहर में
अनजान लोगों के बीच
भटक रहा हूँ........
किसे सुनाऊ अपनी व्यथा
लिख रहा हूँ...
और बस, लिख रहा हूँ
लो मैं तो चला, छोड़ तुझें

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